पर ये अस्तित्व की लड़ाई है तेरे और पहाड़ की ! पर ये अस्तित्व की लड़ाई है तेरे और पहाड़ की !
इंसानी रूप में मेरी ही संवेदनाएं मर गई तुम्हारे लिए। इंसानी रूप में मेरी ही संवेदनाएं मर गई तुम्हारे लिए।
मैं जन गण की प्यास, बुझा ल्याऊं खुशहाली। मैं जन गण की प्यास, बुझा ल्याऊं खुशहाली।
हाँ, मैं नदी हूँ। बहती हुई मानों कोई सदी हूँ। हाँ, मैं नदी हूँ। बहती हुई मानों कोई सदी हूँ।
दी हुई आवाज की गूँज, जो आज लौट आई है। दी हुई आवाज की गूँज, जो आज लौट आई है।
कहानियाँ अभी भी अंतहीन हम छोटे से बड़े हो गये हैं। कहानियाँ अभी भी अंतहीन हम छोटे से बड़े हो गये हैं।